Saturday, May 29, 2010

द्रोपदियों का गांव

भूख का दर्द कैसा होता है,
आप में से कुछ समझेंगे कुछ नहीं!समझेगा वही जो भूख को चबाया होगा!भूख चबाना दो दिन,चार दिन तक तो संभव है,उसके आगे तो जीने की जुगत लगानी ही होगी क्यूंकि भूख जीत जाती है, तमाम सिधान्तों पर, विचारों पर और बुनियादी चीज जो नजर आती है, वो सिर्फ और सिर्फ भूख होतीहै!लद्दाख से तिब्बत तक के इलाके में ज़िन्दगी बहुत मुश्किल है!यहाँ सर्दी इन्सान तो क्या ज़मीन को सिकोड़ देती है,इस सिकुडन में रोटी की दिक्कत है,ऊपर से समतल ज़मीन का ना होना!ना घर के लिए जगह होती है ना दाना-पानी उगाने की जगह!खैर वहां के लोगो ने ऐसे में ही अनुकूलन बना लिया है!इस अनुकूलन के भी कुछ निहितार्थ हैं!

दरअसल लोग यहाँ रोटी, ज़मीन और परिवार के लिए घर में एक द्रोपदी रखते हैं!कोई भी द्रोपदी हो वो मजबूरी की ही प्रतीक है!तब मां के वचन का पालन करना था पर तब वचन की विवशता थी आज ये अलग है!आज द्रोपदी किसी वचन को विवश नहीं है!ये द्रोपदी परम्परा का निर्वहन कर रही है! लद्दाख-तिब्बत पट्टी में समतल नहीं, पहाड़ है! यहाँ खेती-बाड़ी की बात तो दूर झोपड़ी डालने तक की जगह नहीं होती, ऐसे में यहाँ लोगों ने कालांतर से ही जीवन की एक नई शैली विकसित कर ली!शैली है एक परिवार के सभी भाइयों की एक पत्नी!

इसका कारण ये है की अगर पत्नी एक होगी तो बंटवारे की समस्या नहीं आयेगी!चूँकि सबकी पत्नी एक तो सबके बच्चे एक, ऐसे में बंटवारे का प्रश्न नहीं आयेगा!बंटवारा तो तब होगा ना जब सबका अलग घर-परिवार होगा!अब यहाँ तो समस्त भाइयों की पत्नी एक तो बाप में फर्क कौन करे और एसा करना मुमकिन भी नहीं!ऐसे में बंटवारे का गणित खुद ब खुद दम तोड़ देता है और ज़िन्दगी पहले से ही खींचे ढर्रे पर चलती रहती है,चलती रहती है!

http://manishmasoom.blogspot.com/2010/05/blog-post_28.html

Sunday, March 7, 2010

सती अनुसुईया


.किसी ने सच ही कहा है कि ये देखने वाले की आंखों पर होताहै


कि वो किस निगाह, किस मानसिकता से किसी को देखता है...


इसी सिलसिले में सती अनुसुईया की कहानी का जिक्र करना चाहता हूं...एक बार किसी सद्पुरुष का प्रवचन सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था...वहीं सुनी थी ये कथा...पता नहीं कितनी याद रही है...अगर कुछ गलत हो तो जिन्हें ठीक से पता हो, सुधार दीजिएगा...अत्री महाराज के लिए सती अनुसुईया का पत्नी धर्म कितना महान था कि नारद जी ने उसकी कीर्ति देवलोक में भी पहुंचा दी...सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती के लिए ये सुनना बड़ा कष्टप्रद था...हठ कर उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, महेश को अनुसुईया का इम्तिहान लेने भेज दिया...तीनों साधु का वेश बनाकर अनुसुईया के द्वार पहुंच गए...अतिथि और साधु का सत्कार धर्म जानकर अनुसुईया ने तीनों से भोजन का आग्रह किया...लेकिन तीनों तो इम्तिहान लेने की ठाने थे...तीनों ने कहा कि भोजन हम इसी शर्त पर करेंगे, अगर तुम नग्न होकर हमें भोजन कराओगी...वाकई सती अनुसुईया के लिए ये धर्मसंकट वाली स्थिति थी...साधुओं को भोजन नहीं कराती तो अतिथि धर्म का पालन नहीं होगा...लेकिन जो शर्त है वो पतिव्रता स्त्री के लिए पूरी करना किसी स्थिति में संभव नहीं...फिर पूरे मनोयोग से सती अनुसुईया ने इस धर्मसंकट से निकलने के लिए प्रार्थना की...इस प्रार्थना ने ही सती अनुसुईया को वो शक्ति दी कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश को छह-छह माह के बालक बना दिया...तीनों को पालने में लिटा दिया...तीनों शिशु की तरह ही पैर पटकने लगे...अब मां अगर शिशु को दूध पिलाती है तो सृष्टि चलती है...अब अपने नवजात शिशुओं से लज्जा का सवाल ही कहां...

Friday, February 5, 2010